प्राकृत भाषा के जानकार भाषा विज्ञानी राजेंद्र प्रसाद सिंह लिखते हैं
प्रयाग में दो नदियों के संगम पर, आज जहाँ कुंभ मेला का आयोजन होता है, वह सातवीं सदी में बौद्धों की महादान भूमि हुआ करती थी। कहा जाता है कि प्रयाग में त्रिवेणी है - गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम परन्तु ऐसा नहीं है.
वाल्मीकि और कालिदास ने सिर्फ गंगा और यमुना का संगम बताया है!
ह्वेनसांग 7 वीं सदी में प्रयाग आए और इसे दो नदियों का संगम बताया.
लिखा कि राजधानी के पूरब, दोनों नदियों के संगम के मध्य में लगभग 10 ली के घेरे की भूमि बहुत सुहावनी और ऊँची है। इस संपूर्ण भूमि में बालू ही बालू है। न जाने किसने प्रयाग में सरस्वती नदी को भी कूदा दिया है।
किशोरीदास वाजपेयी ने लिखा है कि सरस्वती नदी प्रयाग क्या पूरे उत्तर प्रदेश को कभी छुई भी नहीं.'' वेणी '' का अर्थ "नदी" नहीं है। वेणी का अर्थ ''प्रवाह" होता है।तीन नदियों का संगम '' त्रिवेणी '' नहीं है।
तीन प्रवाहों का संगम है - " त्रिवेणी ''
एक प्रवाह गंगा का, एक यमुना का और एक दोनों का सम्मिलित प्रवाह इसलिए वह है त्रिवेणी
त्रिवेणी को तीन नदियों से कोई लेना - देना नहीं है.
प्रयाग में बौद्धों की महादान भूमि का वर्णन ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तान्त में किया है। तब प्रयाग का संगम दस ली के घेरे में विस्तृत था। दूर दूर तक बालू फैला हुआ था। भूमि ऊँची और सुहावनी थी। प्रयाग की इस महादान भूमि पर दान किए जाने का शुभारंभ बुद्धदेव की मूर्ति के अलंकरण से होता था। हर्षवर्धन ने अनेक श्रमणों को यहाँ दान दिए थे।
इसी प्रयाग के रेतीले तट से ह्वेनसांग ने भारत के प्रतापी वैश्य राजा हर्षवर्धन से विदा ली थी।
चीनी इतिहासकार ह्वेनसांग 17 साल भारत में रहा और पूरे भारत का इतिहास लिख कर चीन ले गया
इतिहासकार ह्वेनसांग ने किसी कुम्भ मेला ( 88 हजार ऋषियों की तपोभूमि) का कोई जिक्र ही नहीं किया ??
ये कुम्भ का मेला कब से लगने लगा ? यह कुंभ का मेला का क्या उस समय नहीं था या कुंभ नाम का अस्तित्व भी नहीं था? इसको इतिहास से देखे जाने की जरूरत है कुंभ के मेले में साधु संतों की अखाड़े की परंपरा है
आइए देखते हैं साधु संतों के अखाड़े कितने पुराने हैं
ध्यान रहे कुंभ मेला जीसके इर्द गीर्द घुमता है वो साधुओंके आखाडे इसवी सदी 7 वी के बाद बने है. इससे यही पुष्टी मिलती है की, उस समय आखाडे बने ही नही थे.
सबसे पुराना है अटल आखाडा (646).
उसके बाद महानिर्वाणी आखाडा (759),
आनंद आखाडा (इ.स. 856),
निरंजनी आखाडा (इ.स.904मे बना),
अग्नी आखाडा (1136)
जुना आखाडा (दशनामी नागा) (इ.स.1156),
गुदड आखाडा (इ.सदी 12वी),
उदासीन आखाडा (इ.स.1768).
ये अलग बात है की इन आखाडों का महिमामंडन करने के लिए ब्राह्मणों ने बडे बडे मीथक जोड दिये है, और कहा जाता है की आखाडों की प्रेरना मीथीकल जरासंघ के आखाडासे, परशुरामसे,अगस्त्यसे और आदी शंकराचार्यसे मिली थी. साधु संतों के गुरुकुल होते हैं अखाड़े नहीं अखाड़ा युद्ध की तैयारी या मल्ल युद्ध की तैयारी करने की जगह को कहते हैं आखिर यह किस से युद्ध की तैयारी कर रहे थे।
दरअसल गुप्त साम्राज्य का अस्त हो जानेसे समाजव्यवस्थामे जो अराजक उत्पन्न हुआ था उसे निपटाने ये आखाडे (साधु की टोलीया) बने थे. दबे कुचले शूद्र शोषित वंचित तबके ने जब मुस्लिम आक्रमण का स्वागत किया और अपनी आज़ादी को एहसास किया तब दबे कुचले और शोषित वर्गों को दबाने के लिए अखाड़े का उदय हुआ आज कहते है मुसलमान आक्रमणकारियों से लडने के लिए ये आखाडे बने थे।
(जैसे उस समय समस्त क्षत्रीय सैनीक कोई बचा नही होगा इसलिए सन्यासी नंगे होकर राख लगाकर योद्धा बन गये होगे).
मुस्लिम आक्रमणकारी इसलिए जीते क्योंकि यहां के राजाओं की सारी ताकत दबे कुचले और शोषित वर्ग को दबाने में लगी हुई थी मुस्लिम आक्रमणकारी के आने पर शोषित वंचित तबके ने अपने राजाओं के खिलाफ विद्रोह कर दिया शोषित वंचित तबके ने मुस्लिम आक्रमणकारी का साथ दिया
ह्वेनसांग के समय क्या वर्ण व्यवस्था लागू हो चुकी थी?
फाह्यान ने (399 ईसवी से 412ईसवी) बुद्ध के प्रथम चार शिष्यों को ब्राह्मण नही बताया। ह्वेनसांग 600 ईसवी तक किसी को ब्राह्मण नहीं बताया।
हर्षवर्धन ( 629 ईसवी से 647 ईसवी ) को वैश्य बताया गया । मतलब सातवीं सदी में जाति व्यवस्था बन चुकी थी पर वैश्य राजा हर्षवर्धन भी बुद्धिस्ट ही रहा, भगवान बुद्ध का धम्म पालन व दान कर रहा और बुद्धिस्ट परंपरा निभा रहा है? इसलिए बताने की जरूरत नहीं वर्णव्यवस्था कब लागू हुई होगी।
इससे स्पष्ट है कि बौद्ध संस्कृति एवं परम्परा को दफनाकर ही ब्राह्मणी संस्कृति भारत के मूलनिवासियो पर थोपी गई है। भारत मे ऐसा कौनसा स्थान अछूता है जहाँ पिछले 2000 वर्षों में बुद्ध की शिक्षा नही रही हो?
बौद्ध स्थानों का ब्राह्मणीकरण कर दिया है
सन्यासी और महंत शब्द को लोग ब्राह्मण वैदिक धर्म से जोड़ देते हैं जबकि ऐसा नहीं है
संन्यासी, महन्त जैसी शब्दावली बौद्धों के संदर्भ में आई हैं।
इतिहास में ब्राह्मण का उल्लेख जहाँ करना है, ह्वेनसांग ने स्पष्ट लिखा है।
इतना ही नहीं क्या कुंभ मेला का इतिहास किसीने कभी लिखा नही लिखा आखिर क्यों नहीं लिखा गया कुंभ मेले का इतिहास आखिर वैदिक धर्म ही क्यों बताता है इतिहासकार और इतिहास क्यों नहीं? और जो भी जानकारी ब्राह्मणों के इतिहास कार द्वारा लिखी गई है वाह हवा मे घुमती है उसमे झूट फरेब ही ज्यादा है।

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