कृषि आन्दोलन का इतिहास बहुत पुराना है और विश्व के सभी भागों में अलग-अलग समय पर किसानों ने कृषि नीति में परिवर्तन करने के लिये आन्दोलन किये हैं ताकि उनकी दशा सुधर सके। मोजुदा दौर में मोदी सरकार द्वारा लाया गया कृषि बिल के विरोध में देश में किसान आंदोलन तेज होता दिखाई दे रहा है कृषि अध्यादेश के विरोध में हरियाणा में हुए किशन आंदोलन में भी सरकार ने उनकी नहीं सुनी और किसानों पर लाठियां बरसाई गई इसका मुख्य कारण किसान की आर्थिक हालत दिन प्रति दिन कमजोर हो रही है और वो कर्ज के मकड़ जाल में फंस रहा क्यों की मौजूद दौर में कृषि में लागत बढ़ रही है आमदनी घट रही है जिस कारण से किसानो में आत्म हत्या की घटनाए बढ़ रही है।
कृषि अध्यादेश को लेकर किसानों का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है मोदी सरकार ने जिस जल्दी बाज़ी में कृषि बिल को पास संसद में पास कराया है उसको लेकर भी मोदी सरकार से किसान नाराज़ है कृषि बिल के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे किसान, किसानों का देशव्यापी 25 सितंबर से शुरू होगा , संसद में पारित किये गये तीन कृषि बिलों के विरोध में आज उत्तर प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) ने प्रदर्शन किया. मुजफ्फरनगर भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार बहुमत के नशे में चूर है.
वहीं किशन नेता राकेश टिकैत ने कहा कि देश की संसद के इतिहास में पहली दुर्भाग्यपूर्ण घटना है कि अन्नदाता से जुड़े तीन कृषि विधेयकों को पारित करते समय न तो कोई चर्चा की और न ही इस पर किसी सांसद को सवाल करने का सवाल करने का अधिकार दिया गया. यह भारत के लोकतन्त्र के अध्याय में काला दिन है.
राकेश टिकैत ने कहा कि अगर देश के सांसदों को सवाल पूछने का अधिकार नहीं है तो मोदी जी देश के लिए महामारी के समय नई संसद बनाकर जनता की कमाई का 900 करोड रूपया क्यों बर्बाद कर रहे हैं. आज देश की सरकार पीछे के रास्ते से किसानों के समर्थन मूल्य का अधिकार छीनना चाहती है, जिससे देश का किसान बर्बाद हो जायेगा.
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राकेश टिकैत का आरोप है कि मंडी के बाहर खरीद पर कोई शुल्क न होने से देश की मंडी व्यवस्था समाप्त हो जायेगी. सरकार धीरे-धीरे फसल खरीदी से हाथ खींच लेगी. किसान को बाजार के हवाले छोड़कर देश की खेती को मजबूत नहीं किया जा सकता. इसके परिणाम पूर्व में भी विश्व व्यापार संगठन के रूप में मिले हैं.

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